ज़हर खुद के लिए ही रखो

जो ख़ुद ही ज़हर पी जाते हैं 
दूसरों पर अमृत छलकाते हैं 
वही नीलकंठ महादेव कहलाते हैं। 

आसां नहीं ज़हर ख़ुद के लिए रखना
फूलों को छोड़ कर कांटों पर चलना
कड़वाहट के घूंट गले से यूँ निगलना।

ऐसा सिर्फ वो इंसां कर सकता है
जो अपना कलेजा बड़ा रखता है
रिश्ते सजाने का हुनर समझता है। 

मृदुल व्यवहार मधुर भाषी हो कला
नैतिक मूल्यों की ऊंचाईयों पर चला
गलत रास्तों पर चल न स्वयँ को छला। 

ज़हर ख़ुद के लिए ही रखो मान जाओ
जीवन की यात्रा में प्रेम अमृत बरसाओ 
अपनों के संग सुंदर बगिया महकाओ।

दूसरों के पथ पर जो ढेरों पुष्प सजाते है
भोले बाबा से खूब सारा आशीष पाते हैं
बिन मांगे ही भगवन् झोली भर जाते हैं।

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