कुछ  तो कहो ये दीवारें भी अब कहने लगी है  अकेली तन्हा पथराई सिमटी सी रहने लगी है   कितने  बरस  बीते हैं  उसके  आने की आस में  ज़र्र-ज़र्र टूटकर ज़मी पर रोज़ बिखरने लगी है।

रात की तन्हाई बना देती है  मुझे आवारा नापता हूँ मैं शहर की हर गली हर चौबारा रोशनी में  नहाई सड़कें भी  लगे बुझी सी ठोकरें खाता फिरूँ दर-ब-दर मारा-मारा। गुम हूँ आवारगी  में मेरा कोई ठिकाना नहीं बेवफ़ाई  में खाई चोट किसी  ने जाना नहीं कुछ अफ़वाह बेवजह बदनामContinue Reading

हमसफ़र ना सही हमदर्द बना लो पाँव के छालों पर मरहम लगा दो माना राह पर साथ न चल पाओगे सुख दुख बाँट कर जीना सीखा दो। किस्मत ने खेला बड़ा अज़ीब खेल मुकम्मल नहीं हुआ हमारा सफ़र तन्हाई से लिपट गया पूरा आसमाँ उदासी से भर गई हमारी प्रेमContinue Reading