चुन चुन के लाए हम सितारें हाथ लगाया अंगारा लगता है भीड़ बढ़ती बना काफ़िला क्यूँ कोई नहीं समझता है खोद कर थक गया फावड़ा पाताल भी सूखा मिलता है जल कर सूराख बना बड़ा सूरज गगन में दहकता है अंतिम रात गहन अमावस चाँद खिलने को तड़पता है थकContinue Reading

साहित्य समाज का दर्पण जीवन की है आलोचना सत्य शिव सुंदर से तर्पण लोक मंगल की कामना साहित्य हम सबकी प्रेरणा संस्कृति हमारी है पहचान अपनी लेखनी को सहेजना राष्ट्र की है आन बान शान समाज का कर मार्गदर्शन साहित्यकार जलाते मशाल चिराग़ आलोकित प्रदर्शन प्रतिबिंबित करते विशाल काग़ज परContinue Reading