रात की तन्हाई बना देती है  मुझे आवारा नापता हूँ मैं शहर की हर गली हर चौबारा रोशनी में  नहाई सड़कें भी  लगे बुझी सी ठोकरें खाता फिरूँ दर-ब-दर मारा-मारा। गुम हूँ आवारगी  में मेरा कोई ठिकाना नहीं बेवफ़ाई  में खाई चोट किसी  ने जाना नहीं कुछ अफ़वाह बेवजह बदनामContinue Reading

वो भूली दास्ताँ वो बीते दिन पुराने लो याद आयें हैं फिर से मुझे रुलाने दिल में जले चिराग़ रोशन ज़माना सारा झूठी प्यार क़िताब ग़मों से दिल है हारा मन के उम्मीद पर चले एक शमा जलाने वो भूली दास्ताँ वो बिसरे से तराने टूटी हुई कश्ती बहती नदीContinue Reading