ख्वाहिशें दम तोड़ रही है उम्मींद का दामन बचा नहीं है ज़िंदगी दर्द जोड़ रही है खुशियों का आलम सजा नहीं है मुझ को नहीं हो रहा है यक़ीन क्यूँ दिल में उमस-सी तारी है बेबसी से गुजर रहा है दिन अश्कों से रात अक्सर भारी है। भीड़ में भीContinue Reading

ठिठुर ठिठुर कर रात जागती                भोर की आहट होने तक  बोझ गुलामी का कंधों पर               तुम ढ़ोते रहोगे कब तक।