बरसों से बैठा ये देख रहा मैं राहगीरों को बस आते-जाते अटल साक्षी हूँ इस पथ का बीते दिन यहाँ बीती हर रातें मौसम की कभी ढलती छाया धूल मिट्टी में सदा लिपटा रहा कल भी था वही मैं आज भी अपनी जगह पर सिमटा रहा मंज़िल का हूँ संकेतContinue Reading