कुछ  तो कहो ये दीवारें भी अब कहने लगी है  अकेली तन्हा पथराई सिमटी सी रहने लगी है   कितने  बरस  बीते हैं  उसके  आने की आस में  ज़र्र-ज़र्र टूटकर ज़मी पर रोज़ बिखरने लगी है।

कुछ बातें लिखी हुई मेरे मन की, वो पुराने अखबार ले आओ बेपनाह मोहब्बत थी हमें कभी,वो पुराने एतबार ले आओ  यादों में बिखरे हुए कई अनकहे वादे, लफ्ज़ और ज़ज्बात  मेरी दिलकश आँखों में फिर से, वो पुराने खुमार ले आओ।