सावन में भीगे हम भी सावन में भीगे तुम भी आग लगी सीना दहका आँचल भीगा सा मन का। मोहक बौछारें बरसे मादक हो त्यौं-त्यौं हरषे पायल के गूँजें घुँघरा प्रीतम को छू के बिखरा। पागल बूंदे नाच रही कोमल गंगा धार बही अंचल से गीला झरना चुंबन से अंकोंContinue Reading

सोचिए किस किसान का बेटा किसान है! नए दौर की कब बनेगी यहाँ पर पहचान है परिवर्तन को स्वीकार करना होता मुश्किल आंदोलन ख़त्म पर अब भी अधूरी मंज़िल आलू प्याज़ टमाटर सड़कों पर फेंके जाते ग़रीब बेरोज़गार भूख से पीड़ित मर जाते राजनीति में उलझ गई किसानों की कश्तीContinue Reading

सिंदूर,बिंदिया,चूड़ी,मेहंदी,झूमके,पायल,नथ सावन की रिमझिम बूँदों में पिया मिलन की है रुत आई अश्रु भरे मेरे नयन कटोरों में कहाँ छुपा है तू ओ हरजाई यौवन सज कर खड़ा द्वार पर प्रीतम अब तो तुम आ जाओ सिंदूरी लाली की छटा मुख पर कहती प्रेम का रस बिखराओ माथे की लालContinue Reading

पुस की अंधेरी रात सर्द हवाएं यादों में लेखक मुंशी प्रेमचंद इंसान और पशु प्रेम का भाव सजाती ये कथा पहली पसंद कहानी का नायक हल्कू और जबरू कुत्ते के रात्रि का संघर्ष मार्मिक कथा काव्य में रूपांतरित कर हुआ हृदय को स्पर्श पैसों की तंगी जमीनदार की धौंस जमाContinue Reading

कभी जहर खाकर तो कभी फंदा लगाकर कभी ऊंचाई से गिरकर तो कभी खुद को जलाकर क्यों करते हो आत्महत्या! मरने का इतना साहस है तुममें तो जिंदा रहने की कोशिश कर जाते नई ताक़त नई शक्ति लगाकर जीने की मिशाल बन दिखाते। कमज़ोर तन के मजबूत इरादे देख जीवनContinue Reading

बसंत ऋतुओं का राजा, कहलाता ऋतुराज,  फ़िजा में फूलों की खुशबू,मादकता का अंदाज। कल-कल करती नदियाँ,प्रकृति की अद्भुत छटा, चाँद की चाँदनी ठंडी हवाएँ, रखती मन तरोताजा। नई स्फूर्ति, नया मंजर, नया सबका उल्लास, तितली भँवर कर गुंजन, नई खुशियों का आभास।  पीली हल्दी, पीले हाथ, पीले पहनते परिधान, विवाहContinue Reading

हद से गुजरने की है ख़्वाहिश  मुझे माफ़ कर देना तेरे दिल में उतरने की फरमाइश़ मुझे माफ़ कर देना  आज रात तेरे दीदार के ख़ातिर पल भर जो अगर ठहर जाऊँ तो मुझे माफ़ कर देना

नारी समाज का आभूषण, नारी देश की शान, घर को देकर बहुमूल्य सेवा, बढ़ाती अपनों का सम्मान। नारी बिना पुरुष अधूरा, पुरुष बिना अधूरी नारी, दोनों सम्पूर्ण एक दूजे संग, हमसफर बन गुजारे जिंदगी सारी। नारी के मातृत्व रूप पर, ईश्वर भी बलिहारी जावे, माँ बनकर जीवन देवे, सृष्टि मेंContinue Reading

हाय रे ये ठिठुरती ठंड!!!! पौष माह ये सर्द ठिठुरती रात निर्धन को प्रकृति की कठोर सौगात थर थर कांपते उसके अंग प्रत्यंग सोते जागते करवट लेकर रात निकाले गुदड़ी के संग। हर सुबह सोने की किरणों का इंतजार कभी-कभी हो जाता बेबस और लाचार जब ओले वृष्टि से तापमानContinue Reading

एक दिन अनपढ़ कवि मुझसे मिले कहा कविता कहता हूँ मैं दिल से। लिखना पढ़ना मेरे भाग्य में न था माता पिता का बचपन में सौभाग्य न था। अंदर से एक ज्वाला जगी थी कवि बनने की आशा लगी थी।  जहाँ चाह होती है वही तो राह होती है कुछContinue Reading