चुन चुन के लाए हम सितारें हाथ लगाया अंगारा लगता है भीड़ बढ़ती बना काफ़िला क्यूँ कोई नहीं समझता है खोद कर थक गया फावड़ा पाताल भी सूखा मिलता है जल कर सूराख बना बड़ा सूरज गगन में दहकता है अंतिम रात गहन अमावस चाँद खिलने को तड़पता है थकContinue Reading

ख्वाहिशें दम तोड़ रही है उम्मींद का दामन बचा नहीं है ज़िंदगी दर्द जोड़ रही है खुशियों का आलम सजा नहीं है मुझ को नहीं हो रहा है यक़ीन क्यूँ दिल में उमस-सी तारी है बेबसी से गुजर रहा है दिन अश्कों से रात अक्सर भारी है। भीड़ में भीContinue Reading