स्पिती वैली की रोमांचक यात्रा का आठवाँ दिन – नाको

हिमालय की गोद में स्थित देव भूमि हिमाचल प्रदेश के स्पिती वैली की रोमांचक यात्रा का आठवाँ दिन – नाको
काजा के तीन दिन पलक झपकते ऐसे निकले कि पता ही नहीं चला,मन में नया जोश लेकर एवं ज़िंदगी का एक नया अनुभव लेकर यहाँ से चल दिये हम नाको गाँव की ओर।
उससे पहले बता दूँ कि बेदी जी ने हमारे निकलते समय स्वयँ ही कहा कि वो एक अच्छी कैलीग्राफी वाले से इस भावपूर्ण कविता को होटल की मुख्य दीवाल पर लिखवा कर पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाएंगे, सुन कर सच में बहुत खुशी हुई। मेरी ही लिखी पंक्तियाँ मुझे याद आ गई, खुशियाँ बांटती गई और अमीर होती गयी।
नाको के लिए सफर पर निकले तो पाया कि सड़कों पर तेज गति से कार्य चल रहा था, रास्तों में कई जगहों पर व्यपवर्तन किया हुआ था, सड़कों पर काफी गड्ढे  हो रखे थे,अत्यधिक ट्रैफिक जाम के कारण वाहनों को चलने में काफी मुश्किल हो रही थी। बर्फ बारी शुरू होने के पहले ये कार्य करना अत्यंत जरूरी होता है।
नाको के पहले  गियू की ओर एक रास्ता कटता है, जो 10 किलोमीटर भीतर की ओर जाता है, पहाड़ी क्षेत्र में बसा यह विशिष्ट गाँव है।
जहां साढ़े पांच सौ साल पहले जो भिक्षु ध्यान में लीन हो गए थे , उनकी हड्डी का ढांचा आज भी वैसा का वैसा ही है, कहते हैं कि इस ममी के नाखून और बाल बढ़ते रहते हैं। उनके हम ने जीवंत अद्भुत दर्शन किए।उधर मोनेस्ट्री का जीर्णोद्धार हो रहा था।
यहाँ से तिब्बत बॉर्डर मात्र दस किलोमीटर दूर था। वहाँ से लौटते हुए हम ने अपने भारत देश के सैनिक के घर चाय नाश्ता किया, उनके साथ कुछ फोटो उतारी और परिवार वालों संग गुणवत्तापूर्ण समय बिताया।
काफी मना करने के बावजूद भी उन्होंने उपहार स्वरुप हमें अपने घर में लगे वृक्ष से तोड़ कर बहुत सारी मीठी सेब लाकर दिया।मुझे हमेशा से लगता है कि देश की रक्षा करने वालों के साथ हमारा कुछ गहरा ही नाता है, जहां पर भी मुलाकात हुई, उनसे बहुत प्रेम और सम्मान मिला।
यहाँ से नाको ज्यादा दूर नहीं था लगभग तीन बजे तक हम नाको गांव पहुंच गए, हिमाचल के किन्नोर डिस्ट्रिक्ट के पुह सब डिवीजन  का छोटा सा शीत मरूस्थलीय क्षेत्र, जो समुद्री सतह से 3660 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
यहां मोनेस्ट्री और एक झील है, जो पर्यटकों को आकर्षित करती है।
प्राकृतिक सौंदर्य मन को शांति और सुकून प्रदान करने वाला है। होटल में कदम रखते ही ऐसा लगा कि बस छत पर कुर्सी लगा कर बैठ जाएं और देखते रहे इस खूबसूरती को, पलकों को एक पल भी बंद होना गंवारा नहीं था।
पास की छत पर पूजा हो रही थी, सिर्फ पुरुष दिखाई दे रहे थे।
कुछ लोग बंगाल से आए हुए थे, आपस में यात्रा का विवरण साँझा किया, रात को हम सबने बैठ कर असंख्य तारे देखें, जो प्रदूषण के कारण शहर में कभी नहीं दिखाई देते,शीत का प्रभाव बढ़ता जा रहा था, तारों को देखने का चाव भी बढ़ता जा रहा था, देखते देखते कब आँख लग गई, पता ही नहीं लगा।
भोर में सूरज उदय बहुत सुंदर हुआ, उस की किरणों ने हमारे भीतर भरपूर ऊर्जा भरी।
बंगाली परिवार के युवा पुत्र ने हमारी बड़ी सुंदर तस्वीर उतारी और कहा कि आप दोनों साथ में बहुत अच्छे लग रहे हो, छोटी-छोटी बातों से बड़ी-बड़ी खुशियाँ मिल जाती है और फिर हम नीचे आ गए।होटल के मैनेजर ने प्रेम से पत्तागोभी और सेब लाकर भेंट की, जो बहुत ही अच्छा लगा।
बस किन्नौर के कल्पा गाँव के लिए जा ही रहे थे कि मन में एक रोमांचक ख्याल आया कि जाते-जाते कुछ तो विशेष करते हैं, क्या किया ये बताऊँगी मेरे अगले पोस्ट में।

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