स्पिती वैली की रोमांचक यात्रा – पांचवां दिन – काजा

हिमालय की गोद में स्थित देव भूमि हिमाचल प्रदेश के स्पिती वैली की रोमांचक यात्रा का पांचवां दिन – काजा
ताबो की सुबह बड़ी हसीन थी, जल्द ही उठ कर तैयार हो गए और नाश्ता करके निकल पड़े अपनी नई मंज़िल की ओर, जिसका नाम था “काजा”।
हमारे मन में भरपूर उत्साह, जुनून व रोमांच भरा हुआ था, उससे पहले बता दूँ कि हमारे लिए होटल के स्टाफ बहुत सारी सेब उपहार स्वरुप लेकर आए और देकर ये कहा कि ये विशेष रूप से आपके लिए है, ये उस कल्प वृक्ष से है, जहां से फल स्वयँ ही गिरते हैं, उन्हें तोड़ा नहीं जाता है, सुन कर हमें बहुत प्रसन्नता हुई और ख़ुद के अच्छे कर्मो पर भरोसा और अधिक बढ़ गया, क्योंकि ये सत्य है कि अगर हम अच्छा कर्म करते हो तो लौट कर वही मिलता है और इसी के साथ बड़े प्रेम से एक दूसरे के लिए मंगलकामना करते हुए हम उस नगर के लिए निकल पड़े, जो हिमाचल के लाहौल और स्पिती जिला में स्पिती नदी पर स्थित है।
ये स्पिती घाटी में स्थित 11980 फीट ऊँचा है, ये काजा राष्ट्रीय राजमार्ग 505 से जुड़ा हुआ है, शिमला का रेल स्टेशन और कुल्लू मनाली का हवाई अड्डा ही सबसे करीब है, यहाँ तक आने के लिए सड़क का ही उपयोग करना होता है।
जीवन हो या मौसम हर पल बदलता है और अगले पल क्या होने वाला है, ये हमें क्या किसी को भी नहीं पता है।पहाड़ों की यात्रा का भी अनुभव कुछ ऐसा सा ही होता है।
किसी भी यात्रा की ये विशेषता होती है कि अगर हम जल्दी रवाना होते हैं तो सब कुछ समय सीमा व सोच के मुताबिक रूटीन चलती है और ऐसा ही हमारे आज के दिन की रूपरेखा तैयार हुई थी। काजा के लिए हाईवे बना हुआ है, पर बीच-बीच में सड़क बेहाल है और फिर करीबन बारह तेरह हज़ार फीट की ऊंचाई पर जाना आसान नहीं होता है।
भयावह भूरे काले अद्भुत बालू वाले पहाड़ों से बना शीत रेगिस्तान,ताबो और काजा के रास्ते पर धांनकर मोनस्ट्री, गोम्पा, लेक, जो 12774 फीट ऊंचाई पर स्थित है,इतना घुमावदार रास्ता है कि लेखनी भी नतमस्तक हो रही है, ऐसा लगता है कि बर्फीले पहाड़ नीचे रह गए हैं और हम उससे ऊपर हो गए हैं,बौद्ध धर्म की मान्यता और तिब्बत पैटर्न से बनी अति भव्य मोनेस्ट्री, जिसे देखकर बहुत अच्छा लगा।
एक तल पर सिर्फ बुद्ध की मूर्ति, एंट्री फीस भी देनी होती है और मेडिटेशन के लिए गुफा बनी हुई है, जहाँ पर असीम शांति और कोई आवाज़ नहीं और ऊपर तल पर लामा जो मंत्र पढ़ रहे थे, काली भूरी मिट्टी के पहाड़ पर बसी यह जगह अविस्मरणीय व अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य, जिसका विवरण देना सचमुच असंभव है, अनोखा अनुभव और सदा के लिए स्मृति मन में संजोए फिर उसी रास्ते से पुनः लौट कर नीचे घाटी में हम उतरे और काजा के लिए रवाना हो गए।
यहां से जाना जैसे हमारी आगे की यात्रा में जान भर गई थी। दलाई लामा जी की फोटो द्वारा उपस्थिति अत्यंत प्रभावित करती है।
काजा के जिस होटल में हमारी बुकिंग थी, माशाल्लाह ऐसे खुबसूरत अलग तरह के होटल का जीवन में पहली बार अनुभव हुआ था, सैंट बर्नियाड ब्रीड विशालकाय तन का कुत्ता या यूँ कहें वहाँ का सदस्य अजीज़म से मुलाकात हुई
इंसानों से भी अधिक समझदार और मिलनसार, मालिक के प्रति भक्ति मौजूद थी, फोटो खिंचवाने का शौकीन भी था, जो भी आ रहा था, उनके लिए प्रमुख आकर्षण केंद्र था, अजीज़म के साथ-साथ और भी उसी के गैंग के कुत्ते होटल के भीतर बाहर मौजूद थे।
चलिए यहाँ से जल्दी ही चेक-इन करके लंच लेकर हम निकल पड़े चेचम ब्रिज, किब्बर और कीव मोनस्ट्री देखने के लिए, प्रकृति अपनी सुन्दरता की चरम सीमा पर दिखाई दे रही थी। बर्फीले पहाड़ों पर बादल गजब ढा़  रहे थे।
एशिया का सबसे ऊँचा चेचम ब्रिज,जो 15 साल पहले ही बनाया गया है, पहुँचने पर नीचे देखने के लिए भी साहस की जरूरत थी, आगे कुंजुम पास, जो 15000 फीट ऊँचाई पर स्थित है, यहाँ से लौटे तो लगा ज़िंदगी को फतह कर रहे हैं और फिर हम किब्बर गांव गए, ऐसे लगता है कि बादलों को पकड़ा जा सकता है।
बर्फीला रेगिस्तान और शिखरों पर चमचमाते हिम का ताज और कीव मोनेस्ट्री पहुँचते हुए शाम हो गई।
बौद्ध धर्म की मान्यताओं को नमन वंदन कर के बड़े आनंद से समय बिता कर हम अपने होटल आ गए, एक ही दिन में 12000 से 15000 हज़ार फीट का अनुभव लिया, जो हमारी ज़िंदगी के सफर में पहली बार हुआ था।
पूरे दिन की यात्रा रोमांचित कर रही थी और मन में कुछ ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और सद्भाव भी उमड़ रहे थे कि ऐसे दुर्लभ सफर हर किसी के भाग्य में नहीं होते हैं और ये सिर्फ परमात्मा की कृपा से ही सफ़लतापूर्वक सम्पन्न होते हैं।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र जी मोदी सही कहते हैं कि भारत अपने आप में सम्पूर्ण है,यहाँ पर कमाल की प्रकृति है, जिसको देखने का संकल्प बनाएं तो पूरा जीवन कम होगा, रात का खाना खाने के बाद जब अपने कमरे में गई तभी मैंने तय कर लिया, क्या तय किया वो मेरे अगले पोस्ट पर।

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