दहलीज़

आज मन व्याकुल है,उसने बताया वो फिर इसी शहर में है। वो दिन भी क्या दिन थे जब मन पंख उठाकर उड़ता था, घंटों एक दूजे के संग बैठे होते थे और आंखों में प्रेम का महासमुंद्र हिलोरें लेता था,पुरवाई अंगड़ाई लेकर प्रेम के राग सुनाती थी, एक दूजे को समर्पित मन जीने मरने की कसमें खाता था, तभी ज़िंदगी में भूचाल आ गया, जब मेरे पिताजी को पता चला कि लड़का हमारी जाति का नहीं है और मेरी एक भी नहीं चली। बाउजी ने मेरा व्याह करवा दिया, समय पंख समेटे उड़ता गया,परिवार बढ़ता गया, पर किसी कोने में वो दर्द और प्रेम बसा रह गया, बस उस पर समय की परत चढ़ गई।
दहलीज़ पर खड़ी हूँ, मन विचलित है, उससे मिलने जाना चाहता हूँ , पर ये क्या सामाजिक मर्यादा और संस्कारों की बेड़ी ने जकड़ लिया, परिवार के प्रेम मोहपास ने बाँध लिया, सोचते हुए कुछ ही देर बाद बैचैनी, हताशा और निराशा के बादल छंटने लगे और आत्मविश्वास बढ़ने लगा है, याद आने लगा है वो दिन जब मैं जन्म मरण के बीच झूल रही थी, डाक्टर ने मेरे पति से कहा कि बस धर्मपत्नी या बच्चा ही बचाया जा सकता है, मेरे पति ने कहा मेरी सारी जमा पूँजी ले लीजिए पर मुझे दोनों चाहिए, ये ही मेरे जीवन के सूत्रधार है। स्मृति में डूबते हुए मन में एक ही भाव मेरे पति से बढ़कर अब कोई और शख़्स जीवन के लिए विशिष्ट नहीं हो सकता है।लौट गई दरवाज़े से वापस घर के अंदर और आज घर का रंग कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लगने लगा है ।
एक बात जो मन में कौंध रही थी कि एक बार जो औरत दहलीज़ को लांघ कर कदम उठाती हैं,उन्हें कठिन अग्नि परिक्षा देनी होती है, पर यहाँ सवाल है कि औरत अपनी ख़ुशी के लिए दहलीज़ लाँघ ले तो चरित्रहीन, बदचलन या परित्यक्ता का ख़िताब हासिल कर लेती है और पूरा समाज उसे घृणित नजरों से देखता है, वहीं दूसरी ओर पुरुष अपनी दहलीज़ लाँघ कर आगे बढ़े तो समाज में चुप्पी अथवा मौन क्यों?

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