आँचल भीगा सा

सावन में भीगे हम भी
सावन में भीगे तुम भी
आग लगी सीना दहका
आँचल भीगा सा मन का।
मोहक बौछारें बरसे
मादक हो त्यौं-त्यौं हरषे
पायल के गूँजें घुँघरा
प्रीतम को छू के बिखरा।

पागल बूंदे नाच रही
कोमल गंगा धार बही
अंचल से गीला झरना
चुंबन से अंकों में भरना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *